पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही (अप्रैल–जून) में 7.8% की वास्तविक GDP वृद्धि दर्ज की, जो RBI के 7% के अनुमान से अधिक है। यह वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता को दर्शाता है।
आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले कारक
- विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में वृद्धि: विनिर्माण क्षेत्र में 9.2% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि विगत वर्ष की इसी तिमाही में यह 8.3% थी। सेवा क्षेत्र में वृद्धि दर बढ़कर 10% हो गई, जो एक वर्ष पहले 8% थी।
- कृषि क्षेत्र की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही और यह 3.6% रही, जबकि एक वर्ष पहले यह 4.4% थी। हालांकि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के सुदृढ़ प्रदर्शन ने कृषि क्षेत्र की मंदी की भरपाई कर दी।
- मजबूत घरेलू मांग: ग्रामीण और शहरी उपभोग में तेजी बनी रही, जिसका संकेत सुदृढ़ GST संग्रह, दोपहिया, तिपहिया और चारपहिया वाहनों की बढ़ी हुई बिक्री तथा गैर-तेल, रत्न एवं आभूषण कोर निर्यात में वृद्धि से मिलता है।
- ग्रामीण मांग को PM-KISAN, उच्चतर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तथा किफायती उर्वरकों जैसे उपायों से समर्थन मिला।
- उपभोग में निरंतर वृद्धि ने GDP विस्तार के लिए मांग-पक्ष का एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया।
- निवेश में तीव्र वृद्धि:सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) में 11.9% की वृद्धि हुई, जो एक वर्ष पूर्व दर्ज 5.8% की वृद्धि से दोगुने से भी अधिक है।
- वर्तमान कीमतों पर GFCF में 20.4% की वृद्धि हुई, जिससे GDP में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 34.3% हो गई, जबकि एक वर्ष पूर्व यह 31.4% थी।
प्रमुख आर्थिक अवधारणाएँ
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP):
- GDP किसी निश्चित अवधि (सामान्यतः एक तिमाही या एक वर्ष) के दौरान देश के घरेलू क्षेत्र के अंदर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को दर्शाता है।
- वर्तमान आधार वर्ष: 2022-23
- जारीकर्ता संस्था: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)।
- नाममात्र GDP बनाम वास्तविक GDP:
- नाममात्र GDP किसी देश के आर्थिक उत्पादन को वर्तमान बाजार कीमतों पर मापता है। इसमें मुद्रास्फीति के प्रभाव भी शामिल होते हैं, इसलिए यह वर्तमान मूल्य के आधार पर अर्थव्यवस्था के आकार का आकलन करने में उपयोगी है।
- वास्तविक GDP मुद्रास्फीति के प्रभाव को समायोजित करते हुए उत्पादन का मूल्यांकन स्थिर आधार-वर्ष की कीमतों पर करता है। इससे समय के साथ उत्पादन में हुई वास्तविक वृद्धि का अधिक सटीक आकलन किया जा सकता है।
- आधार वर्ष : आधार वर्ष एक मानक वर्ष होता है, जिसका उपयोग आर्थिक और सांख्यिकीय गणनाओं में तुलना के लिए किया जाता है।
- भारत में GDP अनुमानों की गणना के लिए वर्तमान आधार वर्ष 2022-23 है।
- यह एक संदर्भ बिंदु प्रदान करता है, जिसके आधार पर GDP, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) जैसे संकेतकों के वर्तमान मूल्यों को मापा जाता है, ताकि समय के साथ वास्तविक परिवर्तनों का आकलन किया जा सके।
- महत्व :
- इससे मुद्रास्फीति के प्रभाव को अलग कर वास्तविक आर्थिक वृद्धि को समझने में सहायता मिलती है।
- यह सुनिश्चित करता है कि आँकड़े अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना, उपभोग के स्वरूप और कीमतों को प्रतिबिंबित करें।
चुनौतियाँ
- ऊर्जा की कीमतें: पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें ऊँचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।
- पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की ऊँची कीमतें भारत के आयात बिल, मुद्रास्फीति संबंधी दबाव एवं विनिर्माण लागत को बढ़ा सकती हैं।
- कृषि एवं खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम: कृषि क्षेत्र में केवल 3.6% की वृद्धि हुई है, इसलिए मौसम संबंधी जोखिम अभी भी बने हुए हैं।
- कृषि उत्पादन में कमी से खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की क्रय शक्ति कम हो सकती है।
आगे की राह
- विनिर्माण-आधारित वृद्धि को बनाए रखने और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, कौशल विकास एवं कारोबार सुगमता में सुधार करने की आवश्यकता है।
- कृषि उत्पादन पर मौसम संबंधी जोखिमों को न्यूनतम करने के लिए जलवायु-अनुकूल कृषि, सिंचाई, फसल विविधीकरण और बेहतर जल प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- व्यक्तिगत बाजारों में कमजोर मांग के प्रभाव को कम करने के लिए व्यापार साझेदारियों का विस्तार करना तथा वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में भारत का और अधिक एकीकरण सुनिश्चित करना आवश्यक है।
Source: IE
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भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या